
छत्तीसगढ़ का पारंपरिक व्यंजन बासी बोरा स्वाद, सेहत और संस्कृति का अनूठा मिश्रण है। रात भर भीगे चावल में किण्वन (फर्मेंटेशन) होने से विटामिन बी-12, आयरन और प्रोबायोटिक्स प्रचुर मात्रा में मिलते हैं, जो पाचन और हड्डियों को मजबूत बनाते हैं। इसकी ठंडी तासीर गर्मी में लू और पानी की कमी से बचाती है।
रायपुर। छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति और खान-पान में ‘बासी बोरा’ (जिसे स्थानीय स्तर पर ‘बोरबासी’ या ‘बोरे बासी’ भी कहा जाता है) भोजन के साथ-साथ राज्य की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है। रात के बचे हुए पके हुए चावल को पानी में भिगोकर और सुबह उसमें हल्का नमक, दही या मट्ठा, प्याज और हरी मिर्च मिलाकर खाया जाने वाला यह व्यंजन अब केवल गरीबों का भोजन नहीं रह गया है। आधुनिक विज्ञान और कृषि वैज्ञानिकों ने इसके चमत्कारी पोषण मूल्यों (Nutritional Value) को प्रमाणित कर इसे एक सच्चे सुपरफूड के रूप में मान्यता दी है।
बासी बोरा की न्यूट्रिशनल वैल्यू (पोषण मूल्य)
रात भर पानी में भीगे रहने के कारण चावल में ‘फर्मेंटेशन’ (किण्वन) की प्रक्रिया होती है, जिससे इसके पोषक तत्वों में अभूतपूर्व वृद्धि होती है:
विटामिन बी-12 और आयरन की प्रचुरता
फर्मेंटेशन के कारण बासी चावल में विटामिन बी-12 की मात्रा सामान्य चावल की तुलना में कई गुना बढ़ जाती है। साथ ही, इसमें आयरन (लोह तत्व) की मात्रा में भी भारी बढ़ोतरी होती है, जो शरीर में खून की कमी (एनीमिया) को दूर करने में मददगार है।








